क्लिनिकल रिसर्च: इनोवेशन के लिए 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' की जरूरत
भारतीय क्लिनिकल रिसर्च इंडस्ट्री में बदलाव: इनोवेशन के लिए 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' की तैयारी
भारत को लंबे समय से दुनिया की 'फार्मेसी' के रूप में जाना जाता है, लेकिन यह सफलता मुख्य रूप से जेनेरिक दवाओं (Generic Medicines) के बड़े पैमाने पर उत्पादन पर टिकी है। अब, केंद्र सरकार और क्लिनिकल रिसर्च समुदाय भारत के बायोफार्मास्युटिकल (Biopharmaceutical) उद्योग को एक नई दिशा में ले जाना चाहते हैं। लक्ष्य स्पष्ट है: जेनेरिक दवाओं के निर्माण से आगे बढ़कर नई और इनोवेटिव (Innovative) दवाओं की खोज और विकास करना। इस बड़े बदलाव को संभव बनाने के लिए उद्योग के विशेषज्ञों ने 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' (Reverse Brain Drain) यानी विदेशों में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को स्वदेश वापस लाने का सुझाव दिया है।
📌 इस लेख में (Table of Contents) 🔻
- 💠 जेनेरिक मॉडल से इनोवेशन की ओर: क्लिनिकल रिसर्च इंडस्ट्री में बदलाव
- 💠 शोधकर्ताओं और फार्मा कंपनियों पर प्रतिभा की कमी का प्रभाव
- 💠 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' की आवश्यकता: विदेशी भारतीय वैज्ञानिकों की वापसी के तथ्य
- 💠 इनोवेशन इकोसिस्टम: आरएंडडी, इंफ्रास्ट्रक्चर और फंडिंग की वर्तमान स्थिति
- 💠 प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए जरूरी नीतिगत सुधार और व्यावहारिक कदम
- 💠 💡 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर
इंडियन सोसाइटी फॉर क्लिनिकल रिसर्च (ISCR) के प्रतिनिधियों के अनुसार, तकनीकी और वैज्ञानिक प्रतिभाओं की यह वापसी भारत को वैश्विक पटल पर एक रिसर्च हब के रूप में स्थापित कर सकती है। इस दिशा में सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण कदम भी उठाए हैं। आइए समझते हैं कि भारतीय क्लिनिकल रिसर्च इंडस्ट्री में क्या बदलाव हो रहे हैं, इसका प्रतिभाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा और इसके लिए कौन से व्यावहारिक कदम उठाए जा रहे हैं।
जेनेरिक मॉडल से इनोवेशन की ओर: क्लिनिकल रिसर्च इंडस्ट्री में बदलाव
भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग का मौजूदा ढांचा मुख्य रूप से उन दवाओं के निर्माण पर केंद्रित है जिनके पेटेंट समाप्त हो चुके हैं। इसे जेनेरिक मॉडल कहा जाता है। हालांकि यह स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती बनाता है, लेकिन नई बीमारियों और जटिल स्वास्थ्य समस्याओं से निपटने के लिए मौलिक शोध (Original Research) की आवश्यकता होती है। केंद्र सरकार अब घरेलू फार्मा उद्योग पर इनोवेशन (Innovation) के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए लगातार जोर दे रही है।
जेनेरिक से इनोवेशन की ओर इस यात्रा का मतलब है कि भारत केवल दवाओं की कॉपी बनाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मॉलिक्यूल (Molecule) की खोज से लेकर उसके पूर्ण विकास तक का काम यहीं होगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि भारतीय मरीजों को नई और उन्नत जीवनरक्षक दवाएं तेजी से मिल सकेंगी, और भारत विश्व स्तर पर पेटेंटेड दवाओं का एक प्रमुख निर्यातक बन सकेगा। हालांकि, इस बदलाव के लिए उच्च स्तरीय वैज्ञानिक प्रतिभा और मजबूत बुनियादी ढांचे की तुरंत आवश्यकता है।
शोधकर्ताओं और फार्मा कंपनियों पर प्रतिभा की कमी का प्रभाव
इनोवेशन की दिशा में आगे बढ़ने में सबसे बड़ी चुनौती अत्यधिक तकनीकी और कुशल जनशक्ति (Manpower) की कमी है। नई थेरेपी (Therapies) और बायोलॉजिकल्स (Biologicals) के मूल्यांकन के लिए विशेष ज्ञान और अनुभव की आवश्यकता होती है। वर्तमान में, भारतीय क्लिनिकल रिसर्च उद्योग को इस अत्यधिक तकनीकी जनशक्ति की तत्काल आवश्यकता का सामना करना पड़ रहा है।
इंडियन सोसाइटी फॉर क्लिनिकल रिसर्च (ISCR) के मानद महासचिव अनिर्बान रॉयचौधरी (Anirban Roychowdhury) के अनुसार, अत्यधिक तकनीकी कौशल वाले शोधकर्ताओं की कमी का सीधा असर नई दवाओं की खोज की गति पर पड़ता है। केवल प्रयोगशालाओं में ही नहीं, बल्कि नई दवाओं को मंजूरी देने वाले नियामक (Regulatory) ढांचे में भी ऐसे विशेषज्ञों की कमी है जो आधुनिक और जटिल चिकित्सा पद्धतियों का सही और तेजी से मूल्यांकन कर सकें। पर्याप्त विशेषज्ञों के न होने से अप्रूवल (Approval) में समय लगता है, जिससे फार्मा कंपनियों की लागत बढ़ती है और इनोवेशन की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' की आवश्यकता: विदेशी भारतीय वैज्ञानिकों की वापसी के तथ्य
इस प्रतिभा संकट से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने चीन का उदाहरण देते हुए 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन' की वकालत की है। अनिर्बान रॉयचौधरी ने बिजनेसलाइन (BusinessLine) को बताया कि चीन ने 15 साल से अधिक के समय में एक मजबूत इनोवेटिव इकोसिस्टम तैयार किया है। आज चीन इस स्थिति में है कि वह "चीन से दुनिया तक" (from China to the world) अपने उत्पाद पेश कर रहा है। चीन ने यह सफलता अपने "थाउजेंड टैलेंट्स प्रोग्राम" (Thousand talents programme) के जरिए हासिल की, जिसके तहत उन्होंने विदेशों में काम कर रहे अपने शीर्ष वैज्ञानिकों को वापस अपने देश आकर्षित किया।
भारत के संदर्भ में, बड़ी संख्या में भारतीय मूल के विशेषज्ञ (Indian Diaspora) अंतरराष्ट्रीय बायोफार्मास्युटिकल उद्योग में शीर्ष वैज्ञानिक के रूप में काम कर रहे हैं। इसके अलावा, कई भारतीय विशेषज्ञ अंतरराष्ट्रीय नियामक ढांचे (International Regulatory Framework) में समीक्षक (Reviewers) के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यदि इन विशेषज्ञों को उनके अपार अनुभव और तकनीकी ज्ञान के साथ भारत वापस लाया जा सके, तो यह उद्योग की जनशक्ति की तत्काल आवश्यकता को पूरा करने में बहुत मददगार साबित होगा।
इनोवेशन इकोसिस्टम: आरएंडडी, इंफ्रास्ट्रक्चर और फंडिंग की वर्तमान स्थिति
विदेशी प्रतिभाओं को वापस लाने के लिए केवल आह्वान करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें वैसा ही अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और फंडिंग (Funding) देना भी जरूरी है, जैसा उन्हें विदेशों में मिलता है। भारत सरकार ने इस दिशा में अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। केंद्र सरकार ने हाल ही में ₹10,000 करोड़ की बायोफार्मा शक्ति (BioPharma Shakti) फंडिंग की घोषणा की है। यह भारी भरकम फंड रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) के लिए एक मजबूत आधार तैयार करेगा।
इसके अलावा, प्रधानमंत्री रिसर्च चेयर (PMRC - Prime Minister Research Chair) योजना के तहत 13 प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिनमें बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology), हेल्थकेयर (Healthcare) और मेड-टेक (Med-tech) शामिल हैं। क्लिनिकल रिसर्च उद्योग के प्रतिनिधियों के अनुसार, इस योजना का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों में विदेशों से शोधकर्ताओं को आकर्षित करना है ताकि देश में एक मजबूत इनोवेशन इकोसिस्टम का निर्माण किया जा सके।
प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए जरूरी नीतिगत सुधार और व्यावहारिक कदम
फंडिंग और प्रतिभाओं की वापसी के साथ-साथ जमीनी स्तर पर बुनियादी ढांचे और नीतियों में सुधार की सख्त जरूरत है। अनिर्बान रॉयचौधरी के अनुसार, इनोवेशन स्पेस में आगे बढ़ने के लिए उद्योग को प्रारंभिक चरण की ट्रांसलेशनल लैब्स (Early-stage translational labs) की आवश्यकता है। ये लैब्स खोजे गए नए मॉलिक्यूल को प्रयोगशाला से निकालकर उसे आगे विकसित करने का काम बहुत तेजी से करती हैं।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस तरह का बुनियादी ढांचा अकादमिक संस्थानों और अस्पतालों में विकसित किया जाना चाहिए, विशेष रूप से उन स्थितियों के लिए जहां किसी नए मॉलिक्यूल का पहली बार इंसानों पर परीक्षण (First-exposure of the molecule to humans) किया जाना हो।
नियामक सुधार (Regulatory Reforms): केवल बुनियादी ढांचा ही काफी नहीं है; नई थेरेपी और बायोलॉजिकल्स का मूल्यांकन करने के लिए नियामक प्रणाली (Regulatory Bandwidth) को भी मजबूत करना होगा। नई खोजों के लिए अप्रूवल का समय (Approval Times) कम किया जाना चाहिए। रॉयचौधरी ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ये सुधार नहीं किए गए, तो फार्मा कंपनियां यूरोप (Europe) या ऑस्ट्रेलिया (Australia) जैसे स्थानों का रुख करेंगी, जहां उन्हें शोध और अप्रूवल के लिए बेहतर इकोसिस्टम मिलता है।
निष्कर्ष
भारतीय क्लिनिकल रिसर्च उद्योग आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। जेनेरिक दवाओं के बाजार में अपना लोहा मनवाने के बाद, अब इनोवेशन और नई दवाओं की खोज का समय है। ₹10,000 करोड़ की 'बायोफार्मा शक्ति' फंडिंग और PMRC जैसी योजनाएं सही दिशा में उठाए गए कदम हैं। लेकिन, असली सफलता तभी मिलेगी जब भारत अपने विदेशों में काम कर रहे होनहार वैज्ञानिकों को वापस लाने (रिवर्स ब्रेन ड्रेन) में सफल होगा। इसके लिए ट्रांसलेशनल लैब्स का निर्माण और नियामक अप्रूवल प्रक्रिया को तेज करना सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक कदम हैं। यदि भारत यह इकोसिस्टम प्रदान कर पाता है, तो वह दिन दूर नहीं जब दुनिया भर में नई जीवनरक्षक दवाएं 'मेड इन इंडिया' के ठप्पे के साथ निर्यात की जाएंगी।
मुख्य जानकारी
- विशेषज्ञों ने भारतीय फार्मा उद्योग को जेनेरिक से इनोवेशन की ओर ले जाने के लिए विदेशी भारतीय वैज्ञानिकों की वापसी ('रिवर्स ब्रेन ड्रेन') का सुझाव दिया है।
- सरकार ने रिसर्च और विकास को बढ़ावा देने के लिए ₹10,000 करोड़ की 'बायोफार्मा शक्ति' फंडिंग की घोषणा की है।
- अनुसंधान को तेज करने और फार्मा कंपनियों को देश में रोकने के लिए अर्ली-स्टेज ट्रांसलेशनल लैब्स के निर्माण और विनियामक सुधारों की आवश्यकता है।
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