June 16, 2020
भारतीय सेना के सिपाही दिन-रात देश की सुरक्षा में खड़े रहते हैं. इनके लिए धूप क्या, छांव क्या… देश में आई आपदा हो या फिर दुश्मन की नापाक हरकतों का मुंहतोड़ जवाब देने की बात हो, किसी भी पथ पर इनके पैर नहीं डगमगाते. इनका सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है. किसी भी कीमत पर देश के नागिरकों की सुरक्षा करना. आमतौर पर आप सेना के नाम पर आर्मी, नेवी और एयरफोर्स को ही जानते हैं. पर भारत के पास कुछ ऐसी भी स्पेशल फोर्सेस हैं, जो सबकी नज़र में आये बिना दुश्मनों के दांत खट्टे करने का हुनर जानती हैं. तो आइये जानते है इस Tech DNA की Video मे कुछ ऐसी ही फोर्सेस के बारे में:

एन.एस.जी/ब्लैक कैट कमांडो
एन.एस.जी या ब्लैक कैट कमांडो देश में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध स्पेशल कमांडो फ़ोर्स में से एक है. यह फ़ोर्स अपने काम को करने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाती. फिर चाहे वह दुश्मन को ढूंढकर निकालना हो या फिर देश में घुसे आतंकवादियों को मारना हो. 1984 में इस फोर्स का गठन किया गया था. यह फ़ोर्स ‘सर्वत्र सर्वोत्तम सुरक्षा’ के मोटो पर काम करती है. 26/11 के मुंबई हमले में बिना किसी मुसीबत के सफलतापूर्वक आतंकियों से निपटने में इन कमांडो का बहुत बड़ा हाथ था. ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ जैसे बड़े मिशन को भी इस फोर्स ने बड़ी समझदारी से संभाला था.

एन.एस.जी कमांडो न सिर्फ भारत बल्कि, विश्व की सबसे बेहतर फोर्स में शुमार है. इसके कमांडो हर दम ट्रेनिंग पर रहते हैं. ताकि, आपातकालीन स्थिति में यह देश को बचाने के लिए तैयार रहें. सिर्फ चुनिन्दा लोग ही इस फोर्स का हिस्सा बन पाते हैं. इसमें शामिल होने के लिए कड़ी परीक्षाओं से होकर गुजरना होता है.

गरुड़ फ़ोर्स
आसमानी रक्षक गरुड़ फोर्स का गठन 2004 में किया गया था. गरुड़ फोर्स हवाई युद्ध में माहिर मानी जाती है. अपने हुनर से इनको पता होता है कि कैसे दुश्मन की सीमाओं में घुसकर अपने साथियों को सफलतापूर्वक बाहर लाना है. गरुड़ फोर्स की ट्रेनिंग भारत की कुछ सबसे सफल फ़ोर्स के द्वारा हुई है. गरुड़ फोर्स को दुनिया के सामने 2004 में एयरफोर्स डे के दिन लाया गया था. मौजूदा समय में 1000 सैनिक गरुड़ फोर्स में काम कर रहे हैं. बाकी फ़ोर्स से अलग गरुड़ फ़ोर्स सिर्फ एयरफोर्स के सैनिकों को ही गरुड़ बनने का मौका देती है. इनकी ट्रेनिंग सबसे लम्बी होती है, जोकि 72 हफ़्तों की है. जबकि पूरी तरह से गरुड़ फोर्स में शामिल होने में लगभग 3 साल तक का समय लग जाता है. इनका मोटो है ‘प्रहार से सुरक्षा’. यह हर तरह के प्रहार से देश की सुरक्षा करने के लिए तैयार रहते हैं.

मार्कोस
मार्कोस भारतीय नौसेना की सर्वोत्तम स्पेशल फ़ोर्स है. यह हर तरह के कामों में माहिर है. फिर चाहे वह दुश्मन से आमने-सामने की लड़ाई हो, बंधकों को बचाना हो, या फिर डायरेक्ट एक्शन. जल सम्बन्धी कार्यों में तो इन्हें महारत हासिल है. इस फ़ोर्स को ‘दाढ़ी वाली फ़ौज’ के नाम से भी जाना जाता है. क्योंकि यह नागरिकों वाली जगह में दाढ़ी बढ़ा कर आते हैं, ताकि अलग से इन्हें पहचाना न जा सके. मार्कोस कमांडो हमेशा अत्याधुनिक हथियारों से लैस रहते हैं, ताकि यह हर दम दुश्मन से आगे रह सकें. कारगिल युद्ध और मुबई 26/11 हमले में मार्कोस कमांडो ने भी साथ दिया था.

मार्कोस बनने की ट्रेनिंग दो साल की होती है. इसकी खास बात यह है कि इसमें 20-24 साल के युवाओं का ही चयन किया जाता है. अपनी ट्रेनिंग के दौरान इन्हें अमेरिका व ब्रिटिश स्पेशल फोर्स के साथ काम करने व सीखने का मौका भी मिलता है, जिससे यह हर तरह से लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं.

कोबरा फ़ोर्स
कोबरा फोर्स को ‘कमांडो बटालियन फॉर रेसोलूट एक्शन’ के नाम से भी जाना जाता है. यह सी.आर.पी.एफ की स्पेशल फ़ोर्स है. इनका काम है जंगल की लड़ाईयां लड़ना, इनकी लड़ाई लड़ने के तरीके को गुरिल्ला टैकटिक्स भी कहते हैं. इस फोर्स का गठन नक्सलवाद का खात्मा करने के लिए किया गया था. बताते चलें कि नक्सली जंगलों में अन्दर तक छुपे रहते हैं, इसलिए उन्हें ढूंढकर निकालने का काम इन्हें दिया जाता है.

इस फ़ोर्स का मोटो ‘यश या मृत्यु’ है. जंगल में होने वाली लड़ाई में कोबरा फोर्स को भारत की सबसे अनुभवी फोर्स कहा जाता है. कोबरा फोर्स के सैनिकों को गुरिल्ला लड़ाई, बम को ढूंढना, जंगल में जिंदा रहने की तरकीबें जैसे हुनर सिखाये जाते हैं.

…ताकि मुश्किल समय में भी सिपाही को पता हो कि उसे क्या करना है. यह फ़ोर्स अब तक दो ‘शौर्य चक्र’ से नवाजी जा चुकी है. इन्हें तीन महीने की कड़ी ट्रेनिंग से होकर गुजरना पड़ता है. ट्रेनिंग के दौरान इन्हें जंगल से जुड़ी हर बात के बारे में बताया जाता है, ताकि वह हर हाल में दुश्मन को मात दे सकें.

घातक फ़ोर्स
घातक फ़ोर्स का काम है भारतीय थल सेना के साथ काम करना. यह एक 20 लोगों की पलटन होती है, जिसका काम है दुश्मन को चौकाना और फिर उस पर हमला करना है. यह थल सेना से आगे चलकर काम करते हैं, ताकि सेना को आने वाले खतरों का पहले ही पता चल जाए. यह दुश्मन के इलाके में छापा मारते हुए जाते हैं. यही नहीं, बड़े-बड़े जंगी हथियारों से यह दुश्मन पर दूर बैठे हुए भी वार कर सकते हैं. कारगिल की जंग में भी इनका सहयोग रहा था. इनकी ट्रेनिंग बहुत ही कठिन व खतरनाक होती है. इन्हें पर्वतारोहण और 50-60 किलोमीटर तेजी से चलने की ट्रेनिंग दी जाती है. इन्हें ट्रेनिग के दौरान हाथों में बन्दूक पकड़कर और पीठ पर 20 किलो वजन रखकर मीलों चलाया जाता है. इस प्रकार यह शारीरिक रुप से बहुत मजबूत होते हैं.

पैरा कमांडो
पैरा कमांडो भारत की सफल फोर्सेस में से एक है. यह सिर्फ ज़मीन नहीं, हवा में भी लड़ सकती है. पैरा कमांडो ने 1971 और 1999 में हुई जंग में बहुत अहम भूमिका निभाई थी. पैरा कमांडो को पैराशूट से कूदकर दुश्मन के इलाकों में अंदर तक घुसने में महारत हासिल होती है. पैरा कमांडो का नाम अभी बीते वर्ष में बहुत सुना गया. हाल ही में हुए सर्जिकल स्ट्राइक में इसने पाकिस्तान के कश्मीर में घुसकर आतंकी ठिकानों को नष्ट किया था. यह आतंकियों से निपटने, बंधकों को बचाने के लिए खासा मशहूर हैं. पैरा कमांडो फ़ोर्स भारत की पहली और सबसे पुरानी पैराशूट रेजिमेंट है. लगभग 3 साल तक चलने वाली इसकी ट्रेनिंग बहुत ही कठिन मानी जाती है.

फ़ोर्स वन
मुंबई हमलों के बाद महराष्ट्र सरकार ने यह फैसला किया कि वह अब अपने महानगर की सुरक्षा के लिए एक खुद की फ़ोर्स बनाएंगी. इसी कड़ी में उन्होंने फोर्स वन का गठन किया. इस फोर्स की सबसे बड़ी ताकत इसकी तेजी है. यह महज़ 15 मिनट में अपने सभी सामानों के साथ तैयार हो जाती है. इनकी ट्रेनिंग में डी.आर.डी.ओ, एन.एस.जी और इज़राइल की स्पेशल फ़ोर्स की कड़ी मेहनत लगती है. विस्फोटक का ज्ञान, अचूकता से दुश्मन पर गोली बरसाने की इनकी कला इनको अलग बनाती है. कहा जाता है कि मुबंई में किसी भी प्रकार के आतंकी हमले को रोकने में यह सक्षम है. इनकी भर्ती के समय 3000 आवेदन आये थे, जिनमें से बस 216 का ही चयन किया गया.

स्पेशल फ्रंटियर फोर्स
भारत-चीन युद्ध के बाद इस फ़ोर्स का गठन हुआ था. इससे कहा गया था कि अगर चीन की ओर से कोई भी अनचाहा कदम उठाया जाए, तो यह फ़ोर्स छिपकर दुश्मन की सीमा में घुसकर उसे खदेड़ दे. वो बात और है कि भारत को कभी इस फोर्स की इसके असली काम की जरूरत नहीं पड़ी. यह ‘रॉ’ के सानिध्य में काम करता है, जो कि एक भारतीय खुफिया संगठन है. इस फोर्स को किसी भी मिशन से पहले प्रधानमंत्री को सूचना देनी पड़ती है.

तो यह थी भारत की सबसे खतरनाक स्पेशल फ़ोर्सेस. इनके कमांडो हर सुरक्षा के लिए तैयार खड़े रहते हैं. इन्हीं के कारण हम और आप चैन से जिंदगी जी पाते हैं. वैसे भी एक कमांडो बनना कोई आसान काम नहीं है, कड़ी मेहनत में शरीर टूट जाने तक की ट्रेनिंग और मानसिक दबाव को झेलना पड़ता है. हंसते-हंसते देश पर अपना सबकुछ न्यौछावर कर देने वाले ऐसे जाबांजों को शत-शत नमन.