Articles by "कहानियाँ"

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🌷 *गुरुसत्संग*🌷
गुरुसत्संग : भगवान हर मनुष्य हृदय रूपी मन्दिर में बैठे हुए है - Bhagavaan Har Manushy Hrday Roopee Mandir Me Baithe Hue Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : भगवान हर मनुष्य हृदय रूपी मन्दिर में बैठे हुए है - Bhagavaan Har Manushy Hrday Roopee Mandir Me Baithe Hue Hai : GuruSatsang
एक बार भगवान दुविधा में पड़ गए! कोई भी मनुष्य जब मुसीबत में पड़ता, तो भगवान के पास भागा-भागा आता और उन्हें अपनी परेशानियां बताता, उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता!

अंतत: उन्होंने इस समस्या के निराकरण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले- देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता हैं, जबकी मै उन्हे उसके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हुँ। फिर भी थोड़े से कष्ट मे ही मेरे पास आ जाता हैं। जिससे न तो मैं कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही तपस्या कर सकता हूं। आप लोग मुझे कृपया ऐसा स्थान बताएं, जहां मनुष्य नाम का प्राणी कदापि न पहुंच सके।

प्रभू के विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले- आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं। भगवान ने कहा- यह स्थान तो मनुष्य की पहुंच में हैं। उसे वहां पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा। इंद्रदेव ने सलाह दी- कि वह किसी महासागर में चले जाएं। वरुण देव बोले- आप अंतरिक्ष में चले जाइए।

भगवान ने कहा- एक दिन मनुष्य वहां भी अवश्य पहुंच जाएगा। भगवान निराश होने लगे थे। वह मन ही मन सोचने लगे- “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं"।

अंत में सूर्य देव बोले- प्रभू! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय में बैठ जाएं! मनुष्य अनेक स्थान पर आपको ढूंढने में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा। ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई। उन्होंने ऐसा ही किया और वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।

उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने के लिए ईश्वर को मन्दिर, ऊपर, नीचे, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है पर वह मिल नहीं रहें हैं।

🙏🌹🙏 परंतु मनुष्य कभी भी अपने भीतर- "हृदय रूपी मन्दिर" में बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पाता। 🙏🌷🙏
🌷 *GuruSatsang*🌷

🙏गुरुसत्संग स्वामी जी🙏
एक संत रोज अपने शिष्यों को सतसंग करते थे। सभी शिष्य इससे खुश थे लेकिन एक शिष्य चिंतित दिखा। संत ने उससे इसका कारण पूछा। शिष्य ने कहा- गुरुदेव, मुझे आप जो कुछ बताते हैं, वह समझ में नहीं आता, मैं इसी वजह से चिंतित और दुखी हूं। गुरु ने कहा- कोयला ढोने वाली टोकरी में जल भर कर ले आओ।
गुरुसत्संग : सत्संग का क्या महत्व - What is the importance of Satsang : GuruSatsang
गुरुसत्संग : सत्संग का क्या महत्व - What is the importance of Satsang : GuruSatsang
शिष्य चकित हुआ, आखिर टोकरी में कैसे जल भरेगा? लेकिन चूंकि गुरु ने यह आदेश दिया था, इसलिए उसने टोकरी में नदी का जल भरा और दौड़ पड़ा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल टोकरी से छन कर गिर गया। उसने टोकरी में जल भर कर कई बार गुरु जी तक दौड़ लगाई लेकिन टोकरी में जल टिकता ही नहीं था। तब वह अपने गुरुदेव के पास गया और बोला- गुरुदेव, टोकरी में पानी ले आना संभव नहीं, कोई फायदा नहीं। गुरु जी बोले- फायदा है। टोकरी में देखो। शिष्य ने देखा- बार बार पानी में कोयले की टोकरी डुबाने से स्वच्छ हो गई है। उसका कालापन धुल गया है। गुरु ने कहा- ठीक जैसे कोयले की टोकरी स्वच्छ हो गई और तुम्हें पता भी नहीं चला। उसी तरह सत्संग बार बार सुनने से ही गुरु कृपा शुरू हो जाती है । भले ही अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है लेकिन तुम सत्संग का लाभ अपने जीवन मे जरुर महसूस करोगे और हमेशा गुरु की रहमत तुम पर बनी रहेगी 
🙏GuruSatsang🙏

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : जिम्मेदारी बोझ नहीं है - Jimmedaaree Bojh Nahin Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : जिम्मेदारी बोझ नहीं है - Jimmedaaree Bojh Nahin Hai : GuruSatsang
बहुत पुरानी बात है कि किसी गाँव में एक साधु रहते थे। दुनिया की मोह माया से दूर होकर जंगल में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। सुबह शाम ईश्वर के गुण गाना और लोगों को अच्छे कर्मों का महत्त्व बताना यही उनका काम था।

एक दिन उनके मन में आया कि जीवन में एकबार माता वैष्णोदेवी के दर्शन जरूर करने चाहिये। बस यही सोचकर साधु महाराज ने अगले दिन ही वैष्णो देवी जाने का विचार बना लिया।

एक पोटली में कुछ खाने का सामान और कपडे बांधे और चल दिए माँ वैष्णोदेवी के दर्शन करने।

ऊँचे पर्वत पर विराजमान माता वैष्णोदेवी के दर्शन के लिए काफी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है।

वो साधु भी धीरे धीरे सर पे पोटली रखकर चढ़ाई चढ़ रहे थे। तभी उनकी नजर एक लड़की पर पड़ी, उस लड़की ने अपनी पीठ पर एक लड़के को बैठाया हुआ था। वो लड़का विकलांग था और वो लड़की उसे कमर पर बैठाकर चढ़ाई चढ़ रही थी।

साधु को ये सब देखकर उस लड़की पर बड़ी दया आयी और वो बोले – बेटी थोड़ी देर रूककर बैठ जा तू थक गयी होगी तूने इतना बोझ उठा रखा है..

वो लड़की बोली – बाबा जी बोझ तो आपने अपने सर पर उठा रखा है ये तो मेरा भाई है……

चलते चलते साधु के पाँव ठिठक गए…..

कितनी बड़ी बात कही थी उस लड़की ने,,,,

कितना गूढ़ मतलब था उस लड़की की बात का – बोझ तो आपने उठा रखा है ये तो मेरा भाई है….

कितनी जिम्मेदारी भरी थी उस मासूम सी लड़की में...

*उस दिन उन साधु को एक बात समझ में आ गयी कि अगर हर इंसान अपनी जिम्मेदारी निभाने लगे तो शायद दुनिया में दुःख नाम की कोई चीज़ ही ना बचे…..*

*अपनी जिम्मेदारी से बचिए मत , जिम्मेदार बनिये , पूरी तरह से अपनी जिम्मेदारी निभाइये।*

*आप जो भी हैं, चाहे डॉक्टर हैं, छात्र हैं, शिक्षक हैं…

अपने हर काम को जिम्मेदारी से कीजिये। अगर बोझ समझ कर करेंगे तो आप उस काम में कभी सफल नहीं हो पायेंगे। इसीलिए सफल होने के लिए आपका एक जिम्मेदार इंसान होना बेहद जरुरी है।*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : गुरु आपके हमेशा अंग संग है - Guru Aapake Hamesha Ang Sang Hai : GuruSatsang
गुरुसत्संग : गुरु आपके हमेशा अंग संग है - Guru Aapake Hamesha Ang Sang Hai : GuruSatsang
*एक बार स्वामी विवेकानंद जी किसी स्थान पर प्रवचन दे रहे थे । श्रोताओ के बीच एक मंजा हुआ चित्रकार भी बैठा था । उसे व्याख्यान देते स्वामी जी अत्यंत ओजस्वी लगे । इतने कि वह अपनी डायरी के एक पृष्ठ पर उनका रेखाचित्र बनाने लगा।*

*प्रवचन समाप्त होते ही उसने वह चित्र स्वामी विवेकानंद जी को दिखाया । चित्र देखते ही, स्वामी जी हतप्रभ रह गए । पूछ बैठे - यह मंच पर ठीक मेरे सिर के पीछे तुमने जो चेहरा बनाया है , जानते हो यह किसका है ? चित्रकार बोला - नहीं तो .... पर पूरे व्याख्यान के दौरान मुझे यह चेहरा ठीक आपके पीछे झिलमिलाता दिखाई देता रहा।*

*यह सुनते ही विवेकानंद जी भावुक हो उठे । रुंधे कंठ से बोले - " धन्य है तुम्हारी आँखे ! तुमने आज साक्षात मेरे गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस जी के दर्शन किए ! यह चेहरा मेरे गुरुदेव का ही है, जो हमेशा दिव्य रूप में, हर प्रवचन में, मेरे अंग संग रहते है ।*

*मैं नहीं बोलता, ये ही बोलते है । मेरी क्या हस्ती, जो कुछ कह-सुना पाऊं ! वैसे भी देखो न, माइक आगे होता है और मुख पीछे। ठीक यही अलौकिक दृश्य इस चित्र में है। मैं आगे हूँ और वास्तविक वक्ता - मेरे गुरुदेव पीछे !"*

*"गुरु शिष्यों में युगों युगों से यही रहस्यमयी लीला होती आ रही है ।"*

*"अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास रखे क्योंकि वह सदैव हमारे साथ हैं.!!"*
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *गुरुसत्संग स्वामी जी*🌷
गुरुसत्संग : कर्म का फल भोगना पडेगा - Karm ka Phal Bhogana Padega : GuruSatsang
गुरुसत्संग : कर्म का फल भोगना पडेगा - Karm ka Phal Bhogana Padega : GuruSatsang
एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था।

उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया।

राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।

जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।'

प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है?"

वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा?"

ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।"

ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः

"मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।"

ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।

किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं?"

तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।" इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ?"

"आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है?"

"यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है। यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥
'अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।"

"महाराज ! आपने क्या कर्म किया था?" 
"सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी। मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था। जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किंतु मैं इसको ढूँढता फिरता था। यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई। जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।"

ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया?"
ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।"

"किस प्रकार?"

"पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है?"

आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं। गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।"

कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे। भगवान श्रीकृष्ण इस समत्व के अभ्यास को ही 'समत्व योग' संबोधित करते हैं, जिसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।
🌷 *GuruSatsang*🌷

🌷 *GuruSatsang*🌷
**एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता उसकी छोटी सी दुकान थी । उससे जो आय होती थी, उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था चूंकि कमाने वाला वह अकेला ही था । इसलिए उसे लगता था कि उसके बगैर कुछ नहीं हो सकता । वह लोगों के सामने डींग हांका करता था ।**
गुरुसत्संग : हर प्राणी को खिलाने वाला कोई और है हम सभी तो अपने अपने किरदार निभा रहे है - Har Praanee ko Khilaane Vaala koee Aur Hai Ham Sabhee to Apane Apane kiradaar Nibha Rahe : GuruSatsang
गुरुसत्संग : हर प्राणी को खिलाने वाला कोई और है हम सभी तो अपने अपने किरदार निभा रहे है - Har Praanee ko Khilaane Vaala koee Aur Hai Ham Sabhee to Apane Apane kiradaar Nibha Rahe : GuruSatsang
**एक दिन वह एक संत के सत्संग में पहुंचा । संत कह रहे थे, “दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता । यह अभिमान व्यर्थ है कि मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा । सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है ।**

**सत्संग समाप्त होने के बाद मुखिया ने संत से कहा, “मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूं उसी से मेरे घर का खर्च चलता है । मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे । संत बोले, “यह तुम्हारा भ्रम है हर कोई अपने भाग्य का खाता है ।**

**उस पर मुखिया ने कहा, “आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए । संत ने कहा, “ठीक है । तुम बिना किसी को बताए घर से एक महीने के लिए गायब हो जाओ । ”उसने ऐसा ही किया । गांव मे यह बात फैला दी कि उसे बाघ ने अपना भोजन बना लिया है । **

**मुखिया के परिवार वाले कई दिनों तकशोक संतप्त रहे गांव वाले आखिरकार उनकी मदद के लिए सामने आए । एक सेठ ने उसके बड़े लड़के को अपने यहां नौकरी दे दी । गांव वालों ने मिलकर लड़की की शादी कर दी एक व्यक्ति छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्च देने को तैयार हो गया एक महीने बाद मुखिया छिपता-छिपाता रात के वक्त अपने घर आया ।**

*घर वालों ने भूत समझ कर दरवाजा नहीं खोला । जब वह बहुत गिड़गिड़ाया और उसने सारी बातें बताईं तो उसकी पत्नी ने दरवाजे के भीतर से ही उत्तर दिया ‘हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है ,अब हम पहले से ज्यादा सुखी हैं । *

*उस व्यक्ति का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया । संसार किसी के लिए भी नही रुकता ! यहाँ सभी के बिना काम चल सकता है तथा संसार सदा से चला आ रहा है और चलता रहेगा । जगत को चलाने की हामी भरने वाले बडे बडे सम्राट, मिट्टी हो गए, जगत उनके बिना भी चला है । इसलिए अपने बल का, अपने धन का, अपने कार्यों का, अपने ज्ञान का गर्व व्यर्थ है । **

**कहने का तातपर्य यह है कि हर प्राणी को खिलाने वाला कोई और है ,हम सभी तो अपने अपने किरदार निभा रहे है फिर अभिमान किस बात का ? **

**अत: सन्त महात्माओं का कथन सत्य है उनके कहने
पर चलो और झूठे अभिमान से बचो ।**

🙏🌹🙏 सतसंग में बहुत बैठते हैं पर सतसंग किसी भागी में बैठता है 🙏🌷🙏
🌷 *गुरुसत्संग*🌷

। गुरुसत्संग
गुरुसत्संग : कहानी प्रतापगढ़ के राजा की (मेहनत और समय) Special Story Pratapgarh Raja :: GuruSatsang
गुरुसत्संग : कहानी प्रतापगढ़ के राजा की (मेहनत और समय) Special Story Pratapgarh Raja :: GuruSatsang
एक समय की बात है, प्रतापगढ़ के राजा की कोई संतान नहीं थी. लेकिन राज्य को आंगे बढ़ाने के लिए एक उतराधिकारी की जरुरत थी. इसलिए राजा ने एक फैसला किया कि वह अपने ही राज्य से किसी एक बच्चे को चुनेगा जो उसका उत्तराधिकारी बनेगा….
इस इरादे से राजा ने अपने राज्य के सभी बच्चों को बुलाकर यह घोषणा की कि वह इन बच्चों में से किसी एक को अपना उत्तराधिकारी चुनेगा…

उसके बाद राजा ने उन बच्चो को एक एक थैली बंटवा दी और कहा….. 
कि आप सब लोगो को जो थैली दी गई है उसमे अलग-अलग फूलों का बीज हैं.. हर बच्चे को सिर्फ एक एक बीज ही दिया गया है… 
आपको इसे अपने घर ले जाकर एक गमले में लगाना है… 
और 6 महीने बाद हम फिर इस आप सब के इस गमले के साथ यहीं इकठ्ठा होंगे और उस समय मैं फैसला करूँगा की कौन इस राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा…
उन लडकों में एक ध्रुव नाम का लड़का था, बाकी बच्चो की तरह वो भी बीज लेकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापस आ गया… 
उसी दिन घर जाकर उसने एक गमले में उस बीज को लगा दिया और उसकी अच्छे से देखभाल की… 
दिन बीतने लगे, लेकिन कई हफ्ते बाद भी ध्रुव के गमले में पौधे का कोई नामोनिशान नही आया…. 
वहीं आस पास के कुछ बच्चों के गमलों में पौधे दिखने लगे… 
लेकिन ध्रुव ने सोचा की हो सकता है की उसका बीज अलग हो… 
यह सोचकर वह पौधे की देखभाल पूरी लगन के साथ करता रहा… 
लेकिन लगभग तीन महीने बीत जाने के बाद भी उसका गमला खली था…. 
जबकि दुसरे बच्चों के गमले में फूल भी खिलने लगे थे….
ध्रुव का खाली गमला देखकर सभी उसका मजाक उड़ाने लगे….. 
पर इसके बावजूद भी ध्रुव ने हार नही मानी और लगातार गमले की देखभाल करता रहा… 
देखते-देखते 5 महीने बीत गये , अब ध्रुव चिंतित था क्योंकि उसके गमले में कुछ नही निकला था । और अब उस गमले की देखभाल में उसकी रूचि कम हो गयी थी । लेकिन उसकी माँ ने समझाया कि - बेटा नतीजा कुछ भी हो लेकिन तुम्हे इस गमले पर अब भी उतनी ही मेहनत और उतना ही समय देना है जितना तुम पहले देते थे ,फिर भले ही गमले के प्रति तुम्हारी ये मेहनत बेरुखी से भरी हो । क्योंकि ऐसा करने से तुम्हे भी एक तसल्ली होगी कि बे चाह और बेरुचि ही सही लेकिन तूने उस गमले के लिये आखरी तक अपनी ड्यूटी और मेहनत दी। बाकी राजा जाने। और फिर अंत में उसकी माँ ने उसे ये भी समझाया कि सोचो अगर राजा को ये पता चलेगा कि आखरी में तुमने गमले के प्रति मेहनत और समय देना बन्द कर लिया था। तो हो सकता है राज तुमसे गुस्सा करें । और ध्रुव माँ की ये सब बातें सुनकर , तो कभी राजा के डर को याद कर , बेरुखी और बेरुचि ही सही लेकिन पूरा समय और मेहनत देता रहा ।
*और 6 महीने पूरे हो गए उस तय हुए दिन सभी बच्चों को महल में इकठ्ठा किया गया सभी के गमलों में पौधे थे…
बस ध्रुव का गमला खाली था… 
राजा बच्चों के बीच से होकर आंगे बढ़ने लगे … 
और गमले में लगे सबके पौधों का निरिक्षण करते… 
सबके पौधे देखते-देखते राजा की नजर ध्रुव के गमले पर पड़ी… 
राजा ने ध्रुव से पूछा… 
क्या हुआ तुम्हारा गमला खली क्यों है?*
*ध्रुव ने हिचकिचाहट के साथ जबाव दिया- जी मैंने तो इस गमले पर पूरे 6 महीने तक अपनी तरफ से पूरी मेहनत की और पूरा पूरा समय भी देता रहा लेकिन इसमें से कुछ भी नही निकला….*
*राजा आंगे बढ़े और सभी के गमले देखने के बाद सभी बच्चों को सम्बोधित करते हुए कहा कि – आप लोगों ने पौधा लाने में बहुत मेहनत की ।ज्यादातर लोग किसी भी कीमत में राजा बनना चाहते हैं लेकिन एक लड़का यहाँ खाली हाथ आया… 
जिसका नाम है ध्रुव… 
राजा ने ध्रुव को अपने पास बुलाया । “राजा के इस तरह बुलाने पर ध्रुव को कुछ अजीब लगा..” ध्रुव धीर-धीरे राजा के पास पहुँचता है… 
जैसे ही राजा ध्रुव के उस खाली गमले को उठाकर सभी बच्चों को दिखता है…. सभी हंसने लगे….*
*राजा ने ऊँची आवाज में कहा- शांत हो जाओ । 6 महीने पहले मैंने आप सब को जो एक एक बीज दिये थे , वे सब बंजर थे जो कभी उग नही सकते थे…. 
आप चाहे उसकी कितनी भी देख रेख कर ले उसमे से कुछ भी नही उग सकता था , लेकिन आप सब ने बीज बदल कर आसानी से उगने वाले दूसरे बीज़ ख़रीदे ताकि आप राजा बन सकें। लेकिन आप सब में सिर्फ ध्रुव ही है जो खाली हाँथ आया है । ध्रुव ने मेरे दिये उस बीज़ पर खूब मेहनत की और जब अंत में उसे लगा कि शायद बीज उगने का कोई चारा नही तो भी बेरुखी से ही सही लेकिन उसने पूरे 6 महीनो तक उस गमले में हर रोज अपनी मेहनत और समय दिया । इसलिये मैं ध्रुव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता हूँ ।*
सो भजन बन्दगी में भी अगर कोई रस नही आता, कोई आनंद या मज़ा नही आता , तो भी बैठो ।
बेरुखी , बेरुचि या डर से ही सही, लेकिन पूरा समय दो
पता नही कब वो मालिक हमारी इस बेरुखी , बेरुचि और डर को प्रेम में बदल कर हमें जीत का सरताज पहना दे ।
। GuruSatsang

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गुरुसत्संग : सत्संग में ज्ञान का इसरा (सेठ और पिंजरे का तोता) - Satsang Gayan ka Isara (Sate aur Pinjare Ka Tota) : GuruSatsang
गुरुसत्संग : सत्संग में ज्ञान का इसरा (सेठ और पिंजरे का तोता) - Satsang Gayan ka Isara (Sate aur Pinjare Ka Tota) : GuruSatsang
एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे।
सेठ के घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था।
तोता एक दिन पूछता है- सेठ जी! आप रोज कहाँ जाते हैं?
सेठ बोला- सत्संग में ज्ञान सुनने जाते हैं।

तोता कहता है- सेठ जी! संत-महात्मा से एक बात पूछना,
कि मैं आजाद कब होऊंगा?
सेठ सत्संग खत्म होने के बाद संत से पूछता है- महाराज! हमारे घर में जो तोता है,
उसने पूछा है कि वो आजाद कब होगा?
संत ऐसा सुनते ही बेहोश होकर गिर जाते हैं।

सेठ संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाता है।
घर आते ही तोता सेठ से पूछता है- सेठ जी! संत ने क्या कहा?

सेठ कहता है- तेरी किस्मत ही खराब है,
जो तेरी आजादी का पूछते ही संत बेहोश हो गए।
तोता कहता है- कोई बात नही सेठ जी! मैं सब समझ गया।

दूसरे दिन जब सेठ सत्संग में जाने लगता है,
तब तोता पिंजरे में जानबूझकर बेहोश होकर गिर जाता है।
सेठ उसे मरा हुआ मानकर जैसे ही उसे पिंजरे से बाहर निकालता है,
तो वो उड़ जाता है।
सत्संग जाते ही संत सेठ से पूछते हैं- कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना,
अब वो कहाँ है?
सेठ कहता है- हाँ महाराज! आज सुबह-सुबह वो जानबूझकर बेहोश हो गया।
मैंने देखा कि वो मर गया है,
इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया।
तब संत ने सेठ से कहा- देखो! तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में ही फंसे हुए हो,
और उस तोते को देखो! बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझकर आजाद हो गया।

------ इस कहानी से तात्पर्य ये है ------
कि हम सत्संग में तो जाते हैं और ज्ञान की बातें करते हैं या सुनते भी हैं,
पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में ही उलझा रहता है।
सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को ही पसंद करते हैं,
जिसमें हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है।
जबकि सत्संग जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर,
सभी बातों को महत्व देना चाहिये।
और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं,
उसे साहस के साथ मन से उतारकर सत्य को स्वीकार करना चाहिए।
🙏गुरुसत्संग🙏

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🍃🌺जय श्री राम🌺 जय वीर हनुमान🌺🍃
राधास्वामी : जैसी करनी वैसी भरनी - लालच बुरी बला है - Jaisee Karanee Vaisee Bharanee - Laalach Buree Bala Hai : Radhaswami
राधास्वामी : जैसी करनी वैसी भरनी - लालच बुरी बला है - Jaisee Karanee Vaisee Bharanee - Laalach Buree Bala Hai : Radhaswami
एक मंदिर में एक ब्राम्हण रहता था| जो दिन रात भगवान् की सेवा में लगा रहता| ब्राम्हण की एक पुत्री थी रूपवती| ब्राम्हण रोज सवेरे उठकर भगवान् की पूजा-पाठ में लग जाता| रूपवती की भी भगवान् में बड़ी आस्था थी| बचपन से ही वह भगवान् की भक्ति में लगी रहती| भगवान् के लिए पुष्प व् पूजन सामग्री एकत्रित करना उसी की ज़िम्मेदारी थी|

समय के साथ-साथ रूपवती बड़ी हुई| अब ब्राम्हण को रूपवती के विवाह की चिंता सताने लगी थी| ब्राम्हण ने सोचा क्यों ने में मंदिर में कथा करना शुरू कर दूँ, जिससे की चढ़ावे में कुछ पैसा आने से मुझे थोड़ी आमदनी भी हो जाएगी और गाँव वालों में भी भगवान् के प्रति आस्था बढ़ेगी|

बस यही सोचकर ब्राम्हण ने अगले दिन से ही मंदिर प्रांगण में ही कथा करना शुरू कर दिया| ब्राम्हण का मानना था की चाहे गाँव वाले उसकी कथा न सुने, लेकिन मंदिर में विराजे भगवान् तो उसकी कथा सुंनेगे ही|

अब ब्राम्हण की कथा में कुछ गाँव वाले आना शुरू हो गए| एक दिन गाँव का ही एक कंजूस सेठ मंदिर में भगवान् का दर्शन करने के लिए आया और दर्शन करने के बाद मंदिर की परिक्रमा करने लगा| तभी उसे मंदिर के अन्दर कुछ आवाज़े सुनाइ दी| उसने मंदिर की पीछे की दिवार पर कान लगा कर सुना तो मंदिर के अन्दर दो लोग एक दुसरे से बात कर रहे थे|

उसने बड़े धयान से सुना… मंदिर के अन्दर भगवान् राम और हनुमान जी आपस में बात कर रहे थे| भगवान् राम हनुमान जी से ब्राम्हण की कन्या के कन्यादान के लिए दो सो रुपयों का प्रबंधन करने का कह रहे थे| भगवान् राम का आदेश पाकर हनुमान जी ने ब्राम्हण को दो सौ रूपए देने की बात भगवान् राम को कही|

सेठ जी ने जब भगवान् राम और हनुमान जी की बात सुनी तो कथा के बाद वे ब्राम्हण से मिले और कथा से होने वाली आय के बारे में पूछा| सेठ जी की बात सुनकर ब्राम्हण बोला – सेठ जी, कथा में बहुत ही कम लोग आ रहें हैं, भला इतने कम श्रद्धालुओं में क्या आय होगी|

सेठ जी ने ब्राम्हण को आश्वासन देते हुए कहा की आज कथा में जो भी आय हो वह ब्राम्हण उन्हें दे दें, इसके बदले में सेठ जी ब्राम्हण को सौ रूपए दे देंगे| ब्राम्हण को भला क्या एतराज़ होता, उन्होंने सेठ जी की बात मान ली| उधर सेठ जी यह सोच रहे थे की ब्राम्हण को आज कथा में हनुमान जी दो सौ रुपए देने वाले हैं जो में ब्राम्हण से ले लूँगा और बदले में उसे सौ रूपए दे दूंगा| जिससे की मेरी सौ रुपए की कमाई हो जाएगी|

शाम को कथा समाप्त होने पर सेठ जी ब्राम्हण के पास आए| उन्हें यकीन था की आज ब्राम्हण को दो सौ रूपए की आय हुई होगी| ब्राम्हण सेठ जी को देखते ही सेठ जी की पास आया और बोला – “सेठ जी आज तो काफी कम भक्त कथा में आए थे जिससे बहुत ही कम आय हुई है| बस दस रूपए ही इकठ्ठा हो पाए हैं!”

सेठ अब करता भी क्या| उसने ब्राम्हण को दिए वचन के अनुसार ब्राम्हण को सौ रूपए दे दिए और इस सौदे में तो सेठ जी को नुकसान हो गया| सेठ जी हनुमान जी पर बहुत गुस्सा हुए की उन्होंने ब्राम्हण को दौ सौ रुपयों की मदद भी नहीं की और भगवान् को दिया अपना वचन भी पूरा नहीं किया|

सेठ जी को हनुमान जी पर बहुत गुस्सा आया| वे गुस्से में मंदिर के अन्दर गए और उन्होंने हनुमान जी की मूर्ति को धक्का दे दिया| सेठ जी ने जैसे ही हनुमान जी की मूर्ति को धक्का देने के लिए अपना हाथी मूर्ति पर रखा हाथ वहीँ चिपक गया| भला हनुमान जी के पकड़ से कोई बच सकता है|

तभी सेठ जी को को फिर एक आवाज़ सुनाई दी| अब भगवान् राम हनुमान जी से ब्राम्हण को दौ सौ रूपए देने के बारे में पुछ रहे थे| भगवान् राम का आदेश सुनकर हनुमान जी बोले “प्रभु..सौ रूपए की मदद तो हो गई है, बाकि बचे सौ रुपयों के लिए सेठ जी को पकड़ के रखा है| जैसे ही वे सौ रूपए देंगे उनको छोड़ देंगे|

सेठ जी ने जैसे ही भगवान् राम और हनुमान जी के बीच की बात सुनी उन्होंने सोचा, “अगर गाँव वालों ने देख लिया की में हनुमान जी की मूर्ति को धक्का मार रहा था और हनुमान जी ने मुझे पकड़ लिया है तो मेरी बहुत बदनामी होगी|”

बस फिर क्या था, “सेठ जी ने हनुमान जी को ब्राम्हण को सौ रूपए देने का वादा किया”

हनुमान जी ने सेठ की बात मानकर उसका हाथ छोड़ दिया और सेठ जी ने अपने वादे अनुसार ब्राम्हण को सौ रूपए दे दिए और सर पकड़ कर चलते बने|

साथियों, इसीलिए कहा गया है ज्यादा लोभ हमेशा हानिकारक होता है| सेठ को उसके लालच की सज़ा मिल गई और ब्राम्हण को उसकी भक्ति का फल| इसीलिए कहा गया है जैसी करनी वैसी भरनी…

🍃🌺🌺जय वीर हनुमान🌺🌺🍃
🙏GuruSatsang🙏

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Satish Kumar

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